जागरण संवाद केंद्र, कुल्लू : बदलती जलवायु चुनौतियों के बीच हिमालयी शुष्क कृषि पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल करते हुए गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र मोहाल (कुल्लू) में हिमालय के शुष्क कृषि पारिस्थितिकी तंत्र के प्रबंधन के लिए जलवायु अनुकूल कृषि विषय पर पाँच दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण आरंभ हुआ। 16 जनवरी तक चलने वाला यह कार्यक्रम हिमालयी क्षेत्रों में कृषि, वानिकी और जल संसाधनों के समन्वित एवं टिकाऊ प्रबंधन पर केंद्रित है।
कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि संदीप शर्मा वन संरक्षक कुल्लू, विशिष्ट अतिथि डा. हंसराज शर्मा (वैज्ञानिक-ई, उत्कृष्टता केंद्र सतत भूमि प्रबंधन एवं भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद देहरादून) तथा केंद्र प्रमुख डा. राकेश कुमार सिंह (वैज्ञानिक-एफ) ने किया।
विभिन्न राज्यों से आए वैज्ञानिक, अधिकारी और विशेषज्ञ इस प्रशिक्षण में सक्रिय सहभागिता कर रहे हैं। केंद्र प्रमुख डा. राकेश कुमार सिंह ने स्वागत संबोधन में हिमालयी शुष्क भूमि में जल संकट, भूमि क्षरण और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जलवायु अनुकूल कृषि ही इन क्षेत्रों में आजीविका और पर्यावरण संतुलन का स्थायी समाधान है। संदीप शर्मा ने अपने व्याख्यान में वनीकरण और वानिकी हस्तक्षेपों को शुष्क हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ बताया।
उन्होंने कहा कि सही प्रजातियों के रोपण और सामुदायिक सहभागिता से भूमि की उत्पादकता और जल धारण क्षमता बढ़ाई जा सकती है। विशिष्ट अतिथि डा. हंसराज शर्मा ने भूमि क्षरण तटस्थता के राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति में उत्कृष्टता केंद्रों की भूमिका पर प्रकाश डाला।
वहीं डा. लक्ष्मी कांत डुकपाल (एनआईएच, रुड़की) ने एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन और आधुनिक जल संरक्षण तकनीकों को हिमालयी शुष्क क्षेत्रों के लिए अत्यंत आवश्यक बताया। उद्घाटन सत्र के पश्चात डा. विनीत जिंदल (पूर्व वैज्ञानिक, हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान) ने पारंपरिक सांस्कृतिक प्रथाओं और पौध संरक्षण की संवेदनशीलता पर सारगर्भित प्रस्तुति दी।
इस दौरान डा. मनीष त्रिपाठी, डा. केसर चंद, डा. वसुधा अग्निहोत्री, डा. किशोर कुमार सहित संस्थान के वैज्ञानिक व आयोजक उपस्थित रहे।

